Posts

उसकी याद

रोज़ तारों को नुमाइश मैं खलल पड़ता है चाँद पागल ही अँधेरे में निकल पड़ता है में समंदर हूँ कुधाली से नहीं कट सकता कोई फव्वारा नहीं हूँ जो उबल पड़ता है कल जहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर अपने रस्ते में जो वीरान महल पड़ता है न तारुफ़ न ताल्लुक है मगर दिल अक्सर नाम सुनता है तुम्हारा उछल पड़ता है उसकी याद आई है साँसों ज़रा धीरे चलो धडकनों से भी इबादत में खलल पड़ता है

ऐसा क्यों होता है ?

ऐसा क्यों होता है ? ऐसा क्यों होता है ? उमर बीत जाती है करते खोज मीत मन का मिलता ही नहीं एक परस के बिना हृदय का कुसुम पार कर कितनी ऋतुएँ खिलता नहीं उलझा जीवन सुलझाने के लिए अनेकों गाँठें खुलतीं वह कसती ही जाती जिसमें छोर फँसे हैं ऊपर से हँसने वाला मन अंदर ही अंदर रोता है ऐसा क्यों होता है? ऐसा क्यों होता है ? छोटी-सी आकांक्षा मन में ही रह जाती बड़े-बड़े सपने पूरे हो जाते सहसा अंदर तक का भेद सहज पा जाने वाली दृष्टि देख न पाती जीवन की संचित अभिलाषा साथ जोड़ता कितने मन पर एकाकीपन बढ़ता जाता बाँट न पाता कोई से सूनेपन को हो कितना ही गहरा नाता भरी-पूरी दुनिया में भी मन खुद अपना बोझा ढोता है ऐसा क्यों होता है ? ऐसा क्यों होता है ? कब तक यह अनहोनी घटती ही जाएगी कब हाथों को हाथ मिलेगा सुदृढ़ प्रेममय कब नयनों की भाषा नयन समझ पाएंगे कब सच्चाई का पथ काँटों भरा न होगा क्यों पाने की अभिलाषा में मन हरदम ही कुछ खोता है! ऐसा क्यों होता है ? ऐसा क्यों होता है ?

मैं कौन हूँ ..........

आखिर हूँ तो मैं कौन हूँ ? इस सवाल से परेशान हूँ ...... मैं हर पल खुद से अनजान हूँ .... कभी ज़मीन कभी आसमान हूँ ..... कभी खुद एक रास्ता हूँ ......... कभी हर रास्ते से अनजान हूँ .... कभी चन्दन कभी मैं धुल हूँ . कभी निश्चय कभी एक भूल हूँ ... कभी महफिल कभी तन्हाई हूँ ..... कभी सतह कभी गहराई हूँ ..... कभी सोच हूँ एक विचार हूँ .... कभी बेबस कभी लाचार हूँ .... कभी उदास कभी निराश हूँ .... कभी एक रौशनी एक आश हूँ ..... कभी पहला कदम एक शुरुवात हूँ . कभी एक अनसुनी सी बात हूँ ..... कभी एक स्पर्श एक एहसाश हूँ ..... कभी उस दिल के कितने पास हूँ ... कभी किसी के दर्द का समाधान हूँ कभी किसी के आंसुओं की पहचान हूँ ... कभी एक खुसी एक हंसी हूँ ..... कभी किन्ही आँखों की नमी हूँ .... कभी दोस्त कभी हमदर्द हूँ ....... कभी खुद किसी का दर्द हूँ ...... एक भावना एक जज्बात हूँ ..... हर रिश्ते की शुरुवात हूँ ....... कभी एक विश्वास कभी एक धोखा हूँ .. एक तनहा हवा का झोंका हूँ .... कभी हर पल मैं एक ख्याल हूँ ... कभी हर वक़्त मैं एक सवाल हूँ .. मैं हर पल को जीना चाहता हूँ . ज़िन्दगी का हर घ...

शीशे के सपने

ये शीशे ये सपने ये रिश्ते ये धागे किसे क्या ख़बर है कहाँ टूट जायें मुहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के न जाने ये किस मोड़ पर डूब जायें अजब दिल की बस्ती अजब दिल की वादी हर एक मोड़ मौसम नई ख़्वाहिशों का लगाये हैं हम ने भी सपनों के पौधे मगर क्या भरोसा यहाँ बारिशों का मुरादों की मंज़िल के सपनों में खोये मुहब्बत की राहों पे हम चल पड़े थे ज़रा दूर चल के जब आँखें खुली तो कड़ी धूप में हम अकेले खड़े थे जिन्हें दिल से चाहा जिन्हें दिल से पूजा नज़र आ रहे हैं वही अजनबी से रवायत है शायद ये सदियों पुरानी शिकायत नहीं है कोई ज़िन्दगी से

मेरी चादर

ये मेरी चादर है, जिसमें मैं खुद को छुपा लेता हूं............. कभी सजाता हूँ अपने आशियाने को इससे ........... कभी खुद इसे आशियाना बना लेता हूँ............. जो जिस्म मेरा झलकता है इन कतरनों से उसको ये छुपा लेती है.......... जो आंसूं गिरे मेरी आंखों से... ये पोछ लेती हैं ........... डर जाता हूँ जब अँधेरे से मैं, ये मुझे लोरियाँ सुना देती हैं ........... जब कभी गिरा मैं ओर ख़ून बहा .... ये सारे ज़ख़्म सोख लेती हैं.......... इतना अकेला हो चुका हूँ ... कि अब बेजान सी चीजों से भी बातें कर लेता हूँ .........

जंग जिंदगी से

मैं दो कदम चलता और एक पल को रुकता मगर........... इस एक पल जिन्दगी मुझसे चार कदम आगे बढ जाती । मैं फिर दो कदम चलता और एक पल को रुकता और.... जिन्दगी फिर मुझसे चार कदम आगे बढ जाती । युँ ही जिन्दगी को जीतता देख मैं मुस्कुराता और...... जिन्दगी मेरी मुस्कुराहट पर हैंरान होती । ये सिलसिला यहीं चलता रहता..... फिर एक दिन मुझे हंसता देख एक सितारे ने पुछा.......... " तुम हार कर भी मुस्कुराते हो ! क्या तुम्हें दुख नहीं होता हार का ? " तब मैंनें कहा................ मुझे पता हैं एक ऐसी सरहद आयेगी जहाँ से आगे जिन्दगी चार कदम तो क्या एक कदम भी आगे ना बढ पायेगी, तब जिन्दगी मेरा इन्तज़ार करेगी और मैं........ तब भी युँ ही चलता रुकता अपनी रफ्तार से अपनी धुन मैं वहाँ पहुँगा......... एक पल रुक कर, जिन्दगी को देख कर मुस्कुराउगा.......... बीते सफर को एक नज़र देख अपने कदम फिर बढाँउगा। ठीक उसी पल मैं जिन्दगी से जीत जाउगा......... मैं अपनी हार पर भी मुस्कुराता था और अपनी जीत पर भी........ मगर जिन्दगी अपनी जीत पर भी ना मुस्कुरा पाई थी और अपनी हार पर भी ना रो पायेगी"

मैं यू ही नहीं लिखता

उनको ये शिकायत है.. मैं बेवफ़ाई पे नही लिखता, और मैं सोचता हूँ कि मैं उनकी रुसवाई पे नही लिखता.' 'ख़ुद अपने से ज़्यादा बुरा, ज़माने में कौन है ?? मैं इसलिए औरों की.. बुराई पे नही लिखता.' 'कुछ तो आदत से मज़बूर हैं और कुछ फ़ितरतों की पसंद है , ज़ख़्म कितने भी गहरे हों?? मैं उनकी दुहाई पे नही लिखता.' 'दुनिया का क्या है हर हाल में, इल्ज़ाम लगाती है, वरना क्या बात?? कि मैं कुछ अपनी.. सफ़ाई पे नही लिखता.' 'शान-ए-अमीरी पे करू कुछ अर्ज़.. मगर एक रुकावट है, मेरे उसूल, मैं गुनाहों की.. कमाई पे नही लिखता.' 'उसकी ताक़त का नशा.. "मंत्र और कलमे" में बराबर है !! मेरे दोस्तों!! मैं मज़हब की, लड़ाई पे नही लिखता.' 'समंदर को परखने का मेरा, नज़रिया ही अलग है यारों!! मिज़ाज़ों पे लिखता हूँ मैं उसकी.. गहराई पे नही लिखता.' 'पराए दर्द को , मैं ग़ज़लों में महसूस करता हूँ , ये सच है मैं शज़र से फल की, जुदाई पे नही लिखता.' 'तजुर्बा तेरी मोहब्बत का'.. ना लिखने की वजह बस ये!! क़ि 'शायर' इश्क़ में ख़ुद अपनी, तबाही पे नहीं लिखता......